तुम जब–जब करोगे धूप की ख्वाहिश, उस वक्त घना कोहरा होगा हर तरफ़। वैसे उसका होना कुछ गलत नहीं, मगर बस वो नहीं है जो तुम्हें चाहिए या फिर जिसकी तुमने कोई उम्मीद रखी थी। बसंत के मौसम में लाज़मी होगा तुम्हें सब फीका फीका सा लगे। चारों तरफ किलकारियों का शोर हो और तुम गुमसुम, उदास बैठे न जाने क्या सोच रहे होगे। शाम भी ढलेगी, सुबह भी होगी, और फिर तमाम शामें और तमाम दिन आयेंगे, जायेंगे और फिर आयेंगे मगर तुम उसी निराशा से जिंदगी जी रहे होगे। बरसात के मौसम में एक दिन था जब तुम्हारे अंदर एक उमंग थी कि बूंदों को महसूस किया जाए, उमड़ते हुए तूफानों को पकड़ा जाए। लहलहाते खेतों की हरियाली तुम्हारा मन मोहती हुई तुम्हारे मन को अद्भुत उमंगों में पिरोती हुई तुम्हें संपूर्ण महसूस करा रही थी। आज तुम्हें वो खेत, खलिहान, तालाब कुछ आकर्षक नहीं लगते। तुम उनके पास से यूं गुजर जाते हो जैसे कि शहरों में चलने वाले यातायात। तुम अब उन दोस्तों से मिल नहीं पाते जो खुद या तो शहर कमाने निकल चुके हैं या फिर संसार के न जाने कौन से कामों में व्यस्त हैं जिनसे पल भर का आराम निकाल पाना एकदम दुर्लभ हो। तुम अनगिनत पलों को खूबसूरती से बिताते हुए एक समय के बाद जिम्मेदारियों का सामान उठा कर न जाने किस ओर निकल आते हो जहां से वापिस निकलना एक बहुत बड़ा मुद्दा बन जाता है। तुम मासूम से बच्चे को अंदर छिपाए न जाने कब संसार से लड़ने वाला एक परिपक्व व्यक्तित्व बन जाते हो। तुम्हारे अंदर डर तो है, मगर झूठ में निडर होने का दावा करते हो। अनगिनत रंगों से रंगे हुए तुम अब अपना वजूद तलाशते हो मगर सब कुछ खत्म सा हो चुका है। तुम अब चाह कर भी खुद को पहचान नहीं पाते। तुम्हें अपना हंसता हुआ चेहरा याद नहीं आता। तुम्हें ये तक याद नहीं कि तुम आखिरी बार कब मुस्कुराए थे। कब तुमने खुशी से चैन की सांस ली थी और कब तुम आराम से सोए थे।नौकरी का क्या है तुम नहीं करोगे तो कोई और करेगा। तुमसे अच्छा, तुमसे बेहतर। बेहतर होगा अगर तुम अपने पंखों से काम लेते रहो। बेहतर हो कि तुम्हे ज्ञात हो कि तुम उड़ने वाले पक्षी हो जो खुले आसमान में विचरण करता है। तुम्हारे लिए यही बेहतर होगा कि तुम एक इंसान बन कर रहो। जिंदगी की जरूरतों को पूर्ण करते हुए सबसे पहले खुद के बारे में सोचो। तुम्हारे मन को कोई गुलामी की जंजीर बांध न सके। तुम्हें बचपन की यादें जिंदा रहें। तुम फिर से किसी पेड़ के नीचे बैठो तो तुम्हें सुकून महसूस हो। किसी पुल के पास से गुजरो तो उसमें पत्थर फेंकने का मन करे। तुम बरसान में भीगो , शोर मचाओ और सबसे पहले तुम्हें ये याद रहे कि जिंदगी कितनी अनमोल है और इसे अपनी शर्तों पे जिया जाना चाहिए। तुम अपनी खुशी खुद बनाओ। जो करना है करो। जी खोल के जियो। अपने पंखो को खोलो और आसमान में उड़ जाओ और हवाओं को महसूस करो।खुशी खुद बनाओ—क्योंकि कोई और आकर तुम्हें खुश कर देगा, इस भ्रम में मत रहो। जो करना है, पूरे मन से करो, बिना इस डर के कि लोग क्या कहेंगे। दिल खोलकर जियो, क्योंकि अधूरी साँसों में बीती ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं कहलाती। अपने पंखों को फैलाओ, आसमान की ऊँचाइयों को छूने से मत डरो। गिरोगे भी तो मिट्टी तुम्हें संभाल लेगी, और उठने का हौसला फिर से देगी।याद रखो, ज़िंदगी किसी और की लिखी हुई कहानी नहीं है जिसे बस निभाते जाना है। यह तुम्हारी अपनी कहानी है—जिसके हर अध्याय में तुम्हें अपने रंग भरने का हक़ है। कभी थक जाओ तो रुक जाना, मगर हार मत मानना। कभी खो जाओ तो खुद को ढूँढने की कोशिश करना, क्योंकि तुम अभी भी वहीं हो—बस ज़िम्मेदारियों और डर की परतों के नीचे दबे हुए।एक दिन आएगा जब धूप की ख्वाहिश पर सचमुच सूरज निकलेगा। कोहरा छँटेगा, रास्ते साफ़ होंगे, और तुम्हें एहसास होगा कि यह सफ़र जितना कठिन था, उतना ही ज़रूरी भी। उस दिन तुम मुस्कुराओगे—सच्ची, बेझिझक मुस्कान के साथ। और तब तुम्हें याद आएगा कि तुम हमेशा से उड़ने के लिए बने थे, सिर्फ़ उड़ान भरने की देर थी। कहानी पढ़ने के लिए धन्यवाद!! लेखक : – "मयंक" Get link Facebook X Pinterest Email Other Apps January 09, 2026 Read more